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आयुर्वेदिक औषधि

त्रिफला मंदूर

संदर्भ: भैषज्यरत्नावली, अम्लपित्ताधिकार 67; शूलरोगाधिकार 108–113

त्रिफला-मंदूर एक पारंपरिक आयुर्वेदिक योग है, जिसमें त्रिफला के तीन फल — हरीतकी, विभीतक और आमलकी — शुद्ध लौह-भस्म (मंदूर), उष्ण मसाले, गौमूत्र और गुड़ मिलाए जाते हैं। प्राचीन ग्रंथ भैषज्यरत्नावली पर आधारित यह योग सदियों से लौह-अभाव अनीमिया, पीलिया, ग्रहणी-व्रण और आंत्र-अवशोषण विकारों के उपचार में उपयोग किया जाता रहा है। मंदूर हीमोग्लोबिन का पुनर्निर्माण करता है।

आमलकी का विटामिन-C लौह-अवशोषण को बेहतर बनाता है, और काली मिर्च तथा शुंठी जैसे मसाले प्रत्येक अवयव की जैव-उपलब्धता बढ़ाते हैं। सामान्य मात्रा 500 mg से 1.5 g चूर्ण है, जिसे गुनगुने पानी के साथ किसी योग्य चिकित्सक के मार्गदर्शन में लेना उचित है।

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त्रिफला मंदूर image

उपयोग और लाभ

  • पक्वाशय-शूल (डुओडेनल अल्सर)
  • कामला (पीलिया)
  • पांडु (अनीमिया / रक्त-अभाव)
  • शोथ (सूजन)
  • अग्निमांद्य (पाचन में बाधा / मंद पाचन)
  • अर्श (बवासीर)
  • ग्रहणी-दोष (मल-अवशोषण विकार)
  • कृमि-रोग (कृमि संक्रमण)
  • गुल्म (पेट की गाँठ)
  • अम्लपित्त (अतिअम्लता / अपच)
  • स्थौल्य (मोटापा)

मुख्य सामग्री

  • विडंग (फल) — Viola odorata (जंगली सुगंधबाला) — 1 भाग
  • चित्रक (मूल) — Plumbago zeylanica — 1 भाग
  • कव्य (तना) — Carissa carandas (करौंदा) — 1 भाग
  • हरीतकी (फल) — Terminalia chebula — 1 भाग
  • विभीतक (फल) — Terminalia bellerica — 1 भाग
  • आमलकी (फल) — Emblica officinalis (आँवला) — 1 भाग
  • शुंठी (प्रकंद) — Zingiber officinale (सूखा अदरक) — 1 भाग
  • मरिच (फल) — Piper nigrum (काली मिर्च) — 1 भाग
  • पिप्पली (फल) — Piper longum (लंबी मिर्च) — 1 भाग
  • मंदूर (लौह-कित्त) — शुद्ध लौह-भस्म — 9 भाग
  • गौमूत्र — गाय का मूत्र — 18 भाग
  • गुड़ — Saccharum officinarum — 9 भाग

खुराक और अनुपान

  • मात्रा: 500 mg – 1.5 g चूर्ण (पाउडर), दिन में एक या दो बार
  • अनुपान (वाहक): परंपरागत रूप से गुनगुने पानी के साथ; दूध के साथ भी लिया जा सकता है। गुड़ पहले से मिश्रित होने के कारण अतिरिक्त मिठास की आवश्यकता नहीं होती।
  • भंडारण: चूर्ण को सूखे और नमी-रहित स्थान पर रखें; उचित भंडारण से यह दीर्घकाल तक उपयोगी बना रहता है।

परंपरागत आयुर्वेदिक तर्क

त्रिफला (हरीतकी, विभीतक, आमलकी) अपनी रसायन-शक्ति से शरीर को पुनर्जीवित करता है और वात-पित्त को संतुलित रखता है। मंदूर (लौह-भस्म) रक्त-तंत्र को सुदृढ़ करता है और रक्त-धातु का पोषण करता है। गौमूत्र शोधन-माध्यम के रूप में कार्य करता है — यह विषाक्त पदार्थों को हटाता है और जठराग्नि को बल देता है, जिससे लौह का अवशोषण सुगम होता है। उष्ण मसाले (चित्रक, मरिच, पिप्पली, शुंठी) लौह के शीत-गुण को संतुलित करते हैं, वात की उत्तेजना को शांत करते हैं और पाचन-मार्ग को सुचारु बनाते हैं।

आधुनिक फार्माकोलॉजी (वैकल्पिक दृष्टिकोण)

  • हरीतकी, विभीतक और आमलकी में पॉलीफेनॉल तथा विटामिन-C प्रचुर मात्रा में होते हैं, जो अल्सरग्रस्त म्यूकस-परत को ऑक्सीकरण-जनित क्षति से बचाते हैं और लौह-अवशोषण को बढ़ावा देते हैं।
  • मंदूर सूक्ष्म कण-रूप में लौह प्रदान करता है, जिससे हीमोग्लोबिन का निर्माण तेज़ी से होता है।
  • चित्रक, मरिच और पिप्पली में पाइपरिन व अन्य जैव-संवर्धक (bio-enhancer) होते हैं, जो आंत्र-पारगम्यता बढ़ाते हैं और लौह तथा फाइटोकेमिकल्स का अवशोषण बेहतर बनाते हैं।
  • गौमूत्र में हल्की रोगाणु-रोधी क्रिया होती है, जो अल्सर-कारक जीवाणुओं को नियंत्रित करने में सहायक हो सकती है।

इन सभी क्रियाओं के समन्वय से त्रिफला-मंदूर अल्सर-उपचार, यकृत-शोधन और रक्त-सुधार का एक प्रभावी योग बनता है।

त्रिफला-मंदूर: प्रत्येक अवयव के आयुर्वेदिक गुण और चिकित्सकीय कार्य

  • विडंग: पित्त को शांत करता है, दाह कम करता है; ग्रहणी की सूजन घटाता है।
  • चित्रक: अग्नि बढ़ाता है, वायुनाशक है; पाचन-शक्ति सुधारता है और अफ़ारा कम करता है।
  • कव्य: कसैला, रस को दृढ़ करता है; अल्सर के क्षत-ऊतक को मजबूत बनाता है।
  • हरीतकी: गहरी रसायन-शक्ति से युक्त; आलस्य दूर कर शरीर को पोषण देता है।
  • विभीतक: वात-पित्त को संतुलित करता है, हल्का रेचक है; पाचन-तंत्र को शुद्ध करता है।
  • आमलकी: विटामिन-C से समृद्ध, उत्तम रसायन है; लौह-अवशोषण सुधारता है और अनीमिया में लाभकारी है।
  • शुंठी: अग्नि को तीव्र करती है; अजीर्ण कम करती है और सूजन-रोधी गुण रखती है।
  • मरिच: अन्य जड़ी-बूटियों की जैव-उपलब्धता बढ़ाता है; लौह-अवशोषण में सहायक है।
  • पिप्पली: अग्नि को गहरा करती है, संधान करती है; जठरांत्र-गति बढ़ाती है।
  • मंदूर: रक्त-धातु का निर्माण करती है; हीमोग्लोबिन बढ़ाती है और अनीमिया दूर करती है।
  • गौमूत्र: शोधन और उष्ण-गति हेतु; रोगाणु-रोधी वातावरण बनाता है और खनिज-अवशोषण में सहायक है।
  • गुड़: मिठास और मधुर रस हेतु; जड़ी-बूटियों की कटुता कम करता है और स्वाद सुधारता है।

चिकित्सकों / छात्रों के लिए मुख्य तथ्य

  • त्रिफला-मंदूर के फल + लौह बाष्म (9 भाग) से रक्त निर्माण होता है।
  • गौमूत्र शोधन और खनिज अवशोषण को तेज़ करता है।
  • मुख्य उपयोग: अल्सर, पीलिया, अनिमिया, सूजन, अवशोषण की समस्याएँ।
  • मानक खुराक: 0.5 g – 1.5 g सूखा पाउडर, सूखा रखें।
  • सूखा रखे तो अनिश्चित काल तक चलती है

चिकित्सा समीक्षक

Syed Aman Hussain

Reviewed By

Syed Aman Hussain

BAMS, MD

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