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आयुर्वेदिक औषधि

कुटजघना वटी

संदर्भ: सिद्धयोगसंग्रह, अतीसार-प्रवाहिका-ग्रहण्याधिकार 10:4; ऋषिम्‌धनु

कुटजघना वटी एक पुरानी आयुर्वेदिक गोली है जो पाचन तंत्र को स्वस्थ रखने में मदद करती है। इसमें *कुटजा* की छाल और *अतीविषा* की जड़ पाउडर मिला होता है। यह औषधि पित्त-कफ दोष को संतुलित करती, अग्नि (पाचक शक्ति) को प्रज्वलित करती और दस्त, एस्सेंटरिया, इरिटेबल बाउल सिंड्रोम, अल्सर कोलाइटिस और अन्य आंतों की सूजन को कम करने में सहायक होती है।

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उपयोग और लाभ

  • दस्त (अतीसारा) – बार-बार पतले दस्त और पेट दर्द को कम करती है।
  • मालअवशोषण सिंड्रोम (ग्रहणि) – पोषक तत्वों के अवशोषण में सुधार लाती है और सूजन व कमजोरी को कम करती है।
  • एस्सेंटरिया (प्रवाहिका) – मल के साथ म्यूकस या रक्त आने पर आराम देती है। इसमें एंटी-अमीबिक गुण होते हैं।
  • दस्त के साथ बुखार (ज्वरतीशारा) – बुखार के साथ पाचन विकारों में उपयोगी।
  • अल्सर कोलाइटिस – कोलन की सूजन को शांत करती है और रक्तस्राव को रोकने में मदद करती है।
  • आंतों के संक्रमण (कृमी) – हानिकारक रोगाणुओं को निकालने में सहायक।

मुख्य सामग्री

  • कुटजा (छाल) – *Holarrhena antidysenterica* – जल-निकाल / डिकॉशन – 1 भाग
  • अतीविषा (जड़) – *Aconitum heterophyllum* – पाउडर – 1 भाग

खुराक और अनुपान

मात्रा: 250-500 मिलीग्राम (1-2 टेबलेट), दिन में 1-2 बार ठंडे पानी (शीतजल) के साथ।

भंडारण: सूखे, हवादार और हवा-रोधी कंटेनर में रखें। यह 2 साल तक प्रभावी रहती है।

नोट: गर्भावस्था में या 2-3 महीने से अधिक समय तक उपयोग करने से पहले आयुर्वेदिक चिकित्सक से परामर्श लें।

सामग्री: क्रियाएँ और लाभ

कुटजघना वटी दो मुख्य जड़ी-बूटियों से बनती है:

  • कुटजा छाल – तीखा असर्ने (पानी कम करने) और जीवाणुनाशक (कीटाणु मारने) प्रभाव देती है। इससे आँत में पानी कम होता है और पित्त-कफ दोष शांत होता है। अध्ययन में दिखा है कि इसमें *कोनेसिन* नामक अल्कालॉयड होते हैं जो *Entamoeba histolytica* जैसे रोगजनकों को रोकते हैं।
  • अतीविषा जड़ – हल्का पाचक उत्तेजक है। यह अग्नि (पाचन-आग) को तेज़ करता, ऐंठन घटाता और पोषक-अवशोषण बढ़ाता है। प्रयोगशाला में इसके एंटी-स्पास्मोडिक और एंटी-ऑक्सीडेंट यौगिकों ने आँत की परत को बचाने की क्षमता दिखाई है।

इन दो जड़ी-बूटियों का मिलन जल-क्रिया घटाता और पाचन-शक्ति बढ़ाता है। इससे नियमित मल त्याग और बेहतर पोषक-अवशोषण होता है।

विशेष क्रिया – रक्तस्राव-रोक (हेमॉस्टैटिक) सहायता

कुटजा में टैनिन नामक पदार्थ रक्त वाहिकाओं को संकरी करके प्लेटलेट को चिपकाते हैं। यह अल्सर कोलाइटिस में छोटे-छोटे रक्तस्राव को रोकने में मदद करता है। यह पारम्परिक उपयोग का आधार है, लेकिन अभी तक मानव-आधारित बड़े अध्ययन नहीं हुए हैं।

आधुनिक वैज्ञानिक व्याख्या

*कुटजा* के एंटी-डायरियल प्रभाव – अल्कालॉयड-कोनेसिन और टैनिन – रोगजनकों को रोकते हैं। *अतीविषा* में स्पास्मोलिटिक-एंटीऑक्सिडेंट युक्तियाँ – जैसे एनोरीबिन और हाइड्रॉक्सी-क्विनोन – मांसपेशी संकुचन को घटाते हैं और आँत की परत को बचाते हैं। दोनों मिलकर दस्त-संबंधी लक्षणों में तेज़ सुधार देते हैं।

यह सामग्रियां एक साथ किन बातों में मदद करती हैं

  • पाचन-अग्नि को तेज़ करती – खाने को अच्छे से तोड़-पछाड़ कर पोषक-अवशोषण बढ़ाती है।
  • आँत-तरल को नियंत्रित करती – अतिरिक्त पानी को पकड़ कर दस्त को कम करती।
  • स्पास्म (ऐंठन) को शांत करती – दर्द में राहत देती।
  • रक्तस्राव को रोकती – अल्सर कोलाइटिस में रक्तस्राव घटाती।
  • रोग-प्रतिरोधक शक्ति बढ़ाती – संक्रमण-रोधी गुणों से आँत को सुरक्षित रखती।

श्लोक एवं व्याख्या

ऋषिम्‌धनु – “कुटजस्य व्याध्यः पित्तकफनिवृत्तिः”

*व्याख्या:* कुुटजा पित्त-कफ को शान्त कर देती है, जिससे डायरिया और अस्थिर पाचन नहीं होते।

सिद्धयोगसंग्रह – “अतीविषा रजः क्षीणम्, अग्निं जाग्रत् कर्तुं समर्थः”

*व्याख्या:* अतीविषा रज (पेर) को कम करके अग्नि को प्रज्वलित करती है, जिससे पाचन-शक्ति बढ़ती है।

चिकित्सा समीक्षक

Syed Aman Hussain

Reviewed By

Syed Aman Hussain

BAMS, MD

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