सामग्री: क्रियाएँ और लाभ
भस्म बनाते समय सबसे पहले धातु या खनिज को शोधन (साफ़-सफ़ाई) किया जाता है। इसमें जड़ी-बूटी का रस, गोमूत्र, छाछ या तिल का तेल इस्तेमाल होता है, जिससे अशुद्धियाँ दूर हो जाती हैं और जड़ी-बूटी के गुण भी पदार्थ पर चिपक जाते हैं। फिर मर्दन (पीसना) के चरण में इन्हें फिर से जड़ी-बूटी के रस से मिलाकर छोटे-छोटे टुकड़े (केक) बनाए जाते हैं। इन केकों को पूटपाक (कोयले की भट्टी) में कई बार गर्म किया जाता है। बार-बार गरम-शोधन से कण नैनो-आकार के बनते हैं, जो पानी पर तैरते हैं और त्वचा की छिद्रों से भी आसानी से प्रवेश कर सकते हैं।
ऊर्जा-वृद्धि: लौह भस्म रक्त निर्माण को पोषित करता है, जिससे थकान घटती है।
पाचन-सहायता: अदरक और काली मिर्च जैसी सामग्री पेट के अंग को गर्म करती हैं, जिससे भोजन को पचाना आसान हो जाता है।
त्वचा-निवारण: स्फटिका भस्म में सिलिकॉन-समान घटक होते हैं, जो घाव को जल्दी भरने में मदद करते हैं।
आधुनिक वैज्ञानिक व्याख्या
प्रयोगशाला में दिखाया गया है कि भस्म में मौजूद कण नैनोकण (nanoparticles) होते हैं, जिनके सतह पर जड़ी-बूटी-अंश चिपके होते हैं। छोटे आकार के कारण इनका सतह-क्षेत्र बहुत बड़ा होता है, जिससे शरीर उन्हें आसानी से अवशोषित कर लेता है। कुछ प्री-क्लिनिकल अध्ययन बताते हैं कि सोना (स्वर्ण) या लोहा भस्म कैंसर कोशिकाओं को मारने या ट्यूमर विकास को धीमा करने में मदद कर सकते हैं, लेकिन यह अभी मानव-परिक्षण में पूरी तरह सिद्ध नहीं हुआ है।
सामग्रियों का प्रभाव
- थकान और एनीमिया: लौह भस्म रक्त निर्माण को समर्थन करता है; आयरन की अवशोषण बढ़ाता है।
- हृदय-दर्द और पेट-बर्न: अकिका भस्म में ठंडे-प्रभाव वाले तत्व होते हैं, जो शक्ति और शांति प्रदान करते हैं।
- किडनी-स्टोन: हजरुलायाहूदा भस्म मांसपेशियों के संकुचन को संतुलित करता है, जिससे पथरी बनना कम होता है।
- त्वचा सुरक्षा: स्फटिका भस्म में सिलिका-जैसे घटक होते हैं, जो घाव-भरण और सूजन-कम करने में सहायक होते हैं।
