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आयुर्वेदिक औषधि

अष्टांगलवण चूर्ण

संदर्भ: भैषज्यरत्नावली, मदात्ययाधिकार: १५-१६; शार्ङ्गधरसंहिता, प्रथमखण्ड, अध्याय १, श्लोक ५१-५३ (आदहमल्ल भाष्य)

अष्टांगलवण चूर्ण एक प्राचीन आयुर्वेदिक पाउडर है जो पाचन को तेज़ करता है, भूख बढ़ाता है और खाने के बाद भारीपन को दूर करता है। यह शरीर की “स्रोतों” (स्रोट) को साफ़ करने में मदद करता है और आम तौर पर पाचन-समस्या (अग्निमण्ड्य), शराब-से-जुड़ी तकलीफ़ (मदात्य) और स्रोट-रोध (स्रोत-बाधा) के लिए लिया जाता है।

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उपयोग और लाभ

अष्टांगलवण चूर्ण का उपयोग निम्नलिखित स्थितियों में किया जाता है:

  • पाचन-समस्या (अग्निमण्ड्य) – 3 से 5 ग्राम, गुनगुने पानी या घी के साथ, दिन में 1-2 बार।
  • शराब-से-जुड़ी तकलीफ़ (मदात्य) – 3 से 5 ग्राम, हल्का दूध या गर्म पानी के साथ, दिन में 1-2 बार।
  • स्रोट-रोध (स्रोत-बाधा) – 3 से 5 ग्राम, गुनगुने पानी के साथ, दिन में 1-2 बार।

मुख्य सामग्री

  • सौवर्तिकल (खनिज-नमक) – 1 भाग (पाचन-रसायन को तेज़ करता है और लार का स्राव बढ़ाता है)।
  • अजाजी (सफ़ेद जीरा) – 1 भाग (वात-और कफ़ा को हटाकर पेट की गति बढ़ाता है)।
  • वृक्षाम्ल (खट्टा फल) – 1 भाग (पित्त को हल्के से बढ़ाता है और खाना तोड़ने में मदद करता है)।
  • अम्लवेतस (दूसरा ख़ट्टा फल) – 1 भाग (पाचन-अग्नि को तेज़ करता है और पेट की चर्बी कम करता है)।
  • त्वक (दालचीनी का छाल) – 1 भाग (मीठा-गरम स्वाद देता है, आंत की परत को शांत करता है)।
  • एला (इलायची) – 1 भाग (सुगंधित खुशबू से पेट फूलने को कम करता है)।
  • मरिच (काली मिर्च) – 1 भाग (तेज़-स्वाद वाला, पेट की मांसपेशियों को सक्रिय करके पाचन तेज़ करता है)।
  • शर्करा (गुड़/शर्करा) – 1 भाग (तीखे मसालों को संतुलित करती है, मीठा-गरम स्वाद देती है)।

खुराक और अनुपान

आमतौर पर 3 से 5 ग्राम चूर्ण, दिन में 1-2 बार गुनगुने पानी, घी या हल्के दूध के साथ लें। खुराक आयुर्वेदिक चिकित्सक के निर्देशानुसार बदल सकती है।

भंडारण: सूखे, एयर-टाइट कंटेनर में रखें। एक वर्ष तक प्रभावी रहता है।

सामग्री: क्रियाएँ और लाभ

अष्टांगलवण चूर्ण में शामिल सभी तत्वों का अपना-अपना कार्य है, पर मिलकर यह “पाचन-अग्नि” को जाग्रत (अग्नि-संधिप) करता है।

सौवर्तिकल लार और पेट की खाना-भाँजने वाली एंजाइम को सक्रिय करता है।

अजाजी और मरिच तीखे होते हैं; ये वात-और कफ़ा-की जड़ता-को-खोलते हैं, जिससे पेट-की मांसपेशियाँ चलती-फिरती हैं।

वृक्षाम्ल और अम्लवेतस हल्के-पित्त-प्रेरक होते हैं, जो भोजन को जल्दी-से-टूटने में मदद करते हैं।

दालचीनी (त्वक) आंत की परत को शांत करती है और पेट की जलन को कम करती है।

इला की सुगंध पेट-फूलाव को घटाती है, जबकि शर्करा तीखे मसालों को “मीठी-संतुलन” देती है, जिससे चूर्ण बार-बार लेना आसान होता है।

इन सभी का समन्वय “अग्नि-संधिप” (पाचन-अग्नि) को फिर से जलाता है, जिससे भारी भोजन के बाद हल्कापन महसूस होता है।

आधुनिक वैज्ञानिक व्याख्या

आधुनिक अध्ययनों में कुछ घटकों के प्रभावों की पुष्टि की गई है:

  • दालचीनी छाल में सिनेमाल्डिहाइड पाया जाता है, जो प्रयोगशाला में हल्की जीवाणुरोधी और सूजन-रोधी प्रभाव दिखाता है।
  • इलायची की आवश्यक तेल कार्मिनेटिव (गैस-कम करने वाला) गुण रखती है, जिससे पेट-फूलाव घटता है।
  • काली मिर्च का पाइपरिन पोषक-तत्वों के अवशोषण को बढ़ाता है और पेट-एंजाइम्स को सक्रिय कर सकता है।
  • सौवर्तिकल (नमक) लार के स्राव को तेज़ करता है, जिससे कार्बोहाइड्रेट-पाचन की शुरुआत होती है।
  • खट्टे फल (वृक्षाम्ल, अम्लवेतस) में प्राकृतिक एसिड (जैसे हाइड्रोक्सी-सिट्रिक एसिड) होते हैं, जो पेट-एसिड को बढ़ाते हैं और खनिजों की घुलनशीलता में मदद करते हैं।

इन सब अनुसंधानों को अभी बड़े पैमाने पर मानव अध्ययनों में साबित नहीं किया गया है, इसलिए इसे “प्रारम्भिक वैज्ञानिक साक्ष्य” के रूप में मानें।

ये सामग्रियां निम्नलिखित में सहायता करती हैं:

  • भोजन के बाद भारीपन को घटाती हैं।
  • गैस और पाचन-असुविधा को कम करती हैं।
  • भूख की कमज़ोरी को बढ़ाती हैं, खासकर देर-रात के भोजन के बाद।
  • शराब-से-जुड़ी उलझन को हल्का करती हैं, क्योंकि मसाले शराब के जले हुए पेट को शांत करते हैं।

चिकित्सा समीक्षक

Syed Aman Hussain

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Syed Aman Hussain

BAMS, MD

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