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आयुर्वेदिक औषधि

अर्शकुत्रा रस

संदर्भ: Yogaratnākara § अर्शकुत्रा रस 265; Bhāsvaprakāśa § अर्शकुत्रा रस

अर्शकुत्रा रस एक पारंपरिक आयुर्वेदिक हर्बो-मिनरल रसा-योग है, जिसमें शुद्ध धातु पाउडर (पारा, लोहे का बहस्मा, अब्रका बहस्मा), पौधों के पाउडर और गोमूत्र एवं गाय दूध जैसे पशु उत्पादों का मिश्रण होता है। यह मुख्य रूप से आर्ज़ा (पाइल्स) के उपचार के लिए उपयोग किया जाता है और पाचन तथा सूजन संबंधी विकारों में भी सहायक है।

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उपयोग और लाभ

अर्शकुत्रा रस का उपयोग आर्ज़ा (पाइल्स), अग्निमंद्या (पाचन में कमी), पाक्तिशूल (डुओडेनल अल्सर), कालनिमा (पीलिया), पाण्डु (अनीमिया), शोथा (सूजन), ग्रहणि (मलविसर्जन में अपूर्णता) और कृमिरोग (आंतों के परजीवी) के उपचार में किया जाता है।

मुख्य सामग्री

  • शुद्ध रसा (पारा) – शुद्ध लाल पारा, जो गहरी सूजन और रक्तस्राव को रोकने में मदद करता है।
  • गंधक शुद्ध – शुद्ध सल्फर, जो पित्त की जलन को कम करता है और मलाशय के घाव भरने में सहायक है।
  • लोहे का बहस्मा – रक्तस्राव को ठीक करता है और अनीमिया में मदद करता है।
  • अब्रका का बहस्मा – पित्त और कफ को संतुलित करता है, ऊतक मरम्मत में सहायक।
  • बिल्वा – पित्त की विषाक्तता को साफ करता है और पाचन स्वास्थ्य को सुधारता है।
  • अग्नि (सिट्राका) – पाचन अग्नि को तेज करता है, अग्निमंद्या में उपयोगी।
  • हला (शुद्ध वातसना्बा) – शरीर से विष निकालता है और रक्तस्राव को नियंत्रित करता है।
  • उष्ण (मरीका) – अन्य घटकों की जैवउपलब्धता बढ़ाता है, परिसंचरण को बढ़ावा देता है।
  • दन्ती – मलाशय की सूजन और दर्द को कम करता है।
  • स्पुता तङ्कण – रक्तस्राव रोकने की शक्ति को बढ़ाता है।
  • यवाक्षरा – पाचन तंत्र को साफ करता है।
  • सिंधुभव (सैन्धव लावण) – सूजन और ऊतक कठोरता को घटाता है।
  • गवांजल (गोमूत्रा) – धातु को शरीर में बेहतर अवशोषित करता है।
  • स्नुगदु्घ्ध (स्नुही कश्येर) – स्वाद मीठा करता है और धातु की तीव्रता को कम करता है।

खुराक और अनुपान

वयस्कों के लिए अनुशंसित खुराक 250 mg से 500 mg प्रतिदिन है, जिसे दो बार में लिया जा सकता है। इसे गाय दूध या गोमूत्र के साथ लिया जाता है। बच्चों या हल्की स्थिति में 250 mg एक बार प्रतिदिन लेना पर्याप्त है। अधिक मात्रा (> 2 ग्राम) से बचें।

परिचय

अर्शकुत्रा रस एक हर्बो-मिनरल रसा-योग है जिसे शास्त्रीय आयुर्वेदिक ग्रंथों में वर्णित किया गया है। इसे शुद्ध धातु पाउडर (जैसे पारा, लोहे का बहस्मा, अब्रका बहस्मा) के साथ कई पौधों के पाउडर और पशु उत्पादों (गोमूत्र, स्नुगदु्ग्ध) को मिलाकर तैयार किया जाता है। परंपरागत रूप से इसका उपयोग आर्ज़ा (मलाशय में पाइल्स) के प्रबंधन के लिए किया जाता है, साथ ही यह पाचन और सूजन संबंधी विकारों पर भी प्रभावी है।

चिकित्सीय उपयोग

अर्शकुत्रा रस का मुख्य उपयोग आर्ज़ा (पाइल्स) के उपचार में किया जाता है। इसके अतिरिक्त यह निम्नलिखित स्थितियों में भी सहायक है:

  • अग्निमंद्या (पाचन में कमी)
  • पाक्तिशूल (डुओडेनल अल्सर)
  • कालनिमा (पीलिया)
  • पाण्डु (अनीमिया)
  • शोथा (सूजन)
  • ग्रहणि (मलविसर्जन में अपूर्णता)
  • कृमिरोग (आंतों के परजीवी)

मुख्य घटक

अर्शकुत्रा रस में निम्नलिखित प्रमुख घटक शामिल हैं:

  • शुद्ध रसा (पारा) – शुद्ध लाल पारा, जो गहरी सूजन और रक्तस्राव को रोकने में मदद करता है।
  • गंधक शुद्ध – शुद्ध सल्फर, जो पित्त की जलन को कम करता है और मलाशय के घाव भरने में सहायक है।
  • लोहे का बहस्मा – रक्तस्राव को ठीक करता है और अनीमिया में मदद करता है।
  • अब्रका का बहस्मा – पित्त और कफ को संतुलित करता है, ऊतक मरम्मत में सहायक।
  • बिल्वा – पित्त की विषाक्तता को साफ करता है और पाचन स्वास्थ्य को सुधारता है।

खुराक और अनुपान

वयस्कों के लिए अनुशंसित खुराक 250 mg से 500 mg प्रतिदिन है, जिसे दो बार में लिया जा सकता है। इसे गाय दूध (स्नुगदु्ग्ध) या गोमूत्र के साथ लिया जाता है। बच्चों या हल्की स्थिति में 250 mg एक बार प्रतिदिन लेना पर्याप्त है।

मलाशय के लिए अर्शकुत्रा रस क्यों चुना जाता है?

अर्शकुत्रा रस को मलाशय के लिए निम्नलिखित कारणों से चुना जाता है:

  • रसा-बहस्मा आधार: पारा और स्पुता तङ्कण से ऊष्ण और रसा-ग्रहण गुण मिलते हैं, जो घायल ऊतक को हटाने और रक्तस्राव रोकने में मदद करते हैं।
  • धातु-पौधे की सहजीवन क्रिया: गंधक और हला शरीर से विष (अमा) निकालते हैं, जिससे दीर्घकालिक पाइल्स में होने वाला अनीमिया ठीक हो सकता है।
  • पाचन अग्नि उत्तेजना: सिट्राका और काली मिर्च पाचन अग्नि को तेज करते हैं, जिससे पित्त और कफ का संतुलन बना रहता है और मलाशय की सूजन कम होती है।
  • सूजन-रोधी और प्रतिमाइक्रोबियल पौधे: बिल्वा, दन्ती और काली मिर्च में सूजन-कम करने और संक्रमण-रोधी गुण होते हैं, जो दर्द और सूजन को घटाते हैं।
  • मृदु वाहन: गोमूत्रा और फ़िल्टर किया हुआ दूध भारी धातु को शरीर में धीरे-धीरे पहुँचाते हैं, जिससे पेट और मलाशय पर कम दुष्प्रभाव पड़ता है।

चिकित्सा समीक्षक

Syed Aman Hussain

Reviewed By

Syed Aman Hussain

BAMS, MD

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