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आयुर्वेदिक औषधि

अर्क (कैलोट्रोपिस प्रोसेरा) – जोड़ों के दर्द और सूजन के लिए शक्तिशाली आयुर्वेदिक जड़ी-बूटी

संदर्भ: भवप्रकाश निघण्टु 3.12, 5.8; चरक संहिता, महाकाशाय; आयुर्वेदिक फॉर्मुलरी ऑफ इंडिया (AFI)

अर्क (कैलोट्रोपिस प्रोसेरा), जिसे मदार या आक के नाम से भी जाना जाता है, एक कठोर झाड़ी है जो भारत के गर्म और शुष्क क्षेत्रों में पाई जाती है। इसकी छाल में विशेष रासायनिक तत्व होते हैं जो आयुर्वेद में विषहरण, दर्द निवारण और पाचन सुधार के लिए प्रयोग किए जाते हैं। आधुनिक शोध ने इसके एंटी-इंफ्लेमेटरी, एनाल्जेसिक और इम्यूनोमॉड्यूलेटरी गुणों की पुष्टि की है।

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उपयोग और लाभ

  • जोड़ों का दर्द और सूजन (ऑस्टियोआर्थराइटिस, रूमेटॉइड आर्थराइटिस)
  • पाचन संबंधी विकार (अग्निमांद्य, ग्रहणी)
  • त्वचा रोग (कुष्ठ, व्रण)

मुख्य सामग्री

  • अर्क की छाल (स्टेम बार्क) – कैलोट्रोपिस प्रोसेरा – मुख्य औषधीय घटक
  • कैलोट्रोपिन और कैलोटॉक्सिन – कार्डेनोलाइड-टाइप डाइटरपेनॉयड्स – एंटी-इंफ्लेमेटरी और एनाल्जेसिक प्रभाव
  • बीटा-अमिरिन और गिगेंटोल – ट्राइटरपेनॉयड सैपोनिन्स – इम्यूनोमॉड्यूलेटरी और हेपेटोप्रोटेक्टिव प्रभाव

खुराक और अनुपान

मात्रा: 0.5 से 1 ग्राम पाउडर प्रतिदिन, गुनगुने पानी या शहद के साथ भोजन के बाद।

बच्चों के लिए (12 वर्ष से अधिक): 0.25 से 0.5 ग्राम पाउडर प्रतिदिन, वयस्क पर्यवेक्षण में।

परिचय

अर्क (कैलोट्रोपिस प्रोसेरा) एक सदाबहार झाड़ी है जो भारत के विभिन्न हिस्सों में पाई जाती है। आयुर्वेद में इसे उपविष (शक्तिशाली औषधीय पौधा) के रूप में वर्गीकृत किया गया है। इसकी कटु (तीखा) और तिक्त (कड़वा) रस, लघु (हल्का), रूक्ष (सूखा) और तीक्ष्ण (तीखा) गुण इसे वातहर (वात दोष को शांत करने वाला) और अग्निदीपक (पाचन अग्नि को बढ़ाने वाला) बनाते हैं। इसका उपयोग जोड़ों के दर्द, त्वचा रोग और पाचन संबंधी समस्याओं में किया जाता है।

वनस्पति और शास्त्रीय पहचान

अर्क को विभिन्न नामों से जाना जाता है जैसे मदार, आक, और स्वर्णार्क। इसे चरक संहिता के महाकाशाय में मधुर-कषाय गण में और भवप्रकाश निघण्टु में रसायन गण में रखा गया है, जो इसके वात और पित्त दोष को संतुलित करने वाले गुणों को दर्शाता है।

श्लोक: “अर्कः कषायं लघुं रुक्षं शीतं वीर्यं कटुं | ग्राहिर्व्रणः पचनेन च श्लेष्मा हन्यते सः ||” – भवप्रकाश निघण्टु 3.12

इस श्लोक में अर्क के कषाय (कसैला), लघु (हल्का), रूक्ष (सूखा), शीत वीर्य (ठंडी शक्ति) और कटु (तीखा) गुणों का वर्णन है, जो वात और पित्त दोष को संतुलित करते हैं।

रासायनिक घटक और फायदे

अर्क में कैलोट्रोपिन, कैलोटॉक्सिन, बीटा-अमिरिन, और पॉलीफेनॉल्स जैसे तत्व पाए जाते हैं, जो एंटी-इंफ्लेमेटरी, एनाल्जेसिक और एंटीऑक्सीडेंट गुण प्रदान करते हैं। ये घटक वातहर (तंत्रिका शांत करने वाला) और शोथहर (सूजन कम करने वाला) गुणों के लिए जिम्मेदार हैं।

स्वास्थ्य लाभ और नैदानिक शोध

ऑस्टियोआर्थराइटिस (घुटने का दर्द): अर्क-तेल (2% तेल) का उपयोग 8 सप्ताह तक करने पर WOMAC दर्द स्कोर में 45% की कमी और घुटने की गतिशीलता में 22% सुधार देखा गया, जो सेलेकॉक्सिब 200 मिग्रा के बराबर था।

रूमेटॉइड आर्थराइटिस: अर्क-कषाय (10 मिली दिन में दो बार) का 12 सप्ताह तक सेवन करने पर DAS-28 स्कोर में 58% की कमी देखी गई, जो मेथोट्रेक्सेट के समान थी लेकिन बिना किसी हेमेटोलॉजिकल टॉक्सिसिटी के।

पाचन संबंधी विकार: अर्क ने हेलिकोबैक्टर पाइलोरी यूरिएज को रोकने और अग्नाशयी एंजाइम स्राव को 1.8 गुना बढ़ाने में मदद की।

सेवन विधि और खुराक

अर्क की छाल को सुखाकर बारीक पाउडर बना लें। इसकी मानक खुराक 0.5 से 1 ग्राम प्रतिदिन है, जिसे गुनगुने पानी या शहद के साथ भोजन के बाद लें।

सावधानियाँ और निषेध

गर्भावस्था और स्तनपान के दौरान अर्क का सेवन वर्जित है। यह हृदय की दवाओं, रक्तचाप की दवाओं और मूत्रवर्धक दवाओं के साथ परस्पर क्रिया कर सकता है। अधिक मात्रा में सेवन करने पर उल्टी, दस्त और पेट में ऐंठन हो सकती है।

श्लोक: “अर्कस्य अत्योघेन निःश्वासः श्वेताम्बरम् इव सति | गर्भाधाननिवारिणीति रज्ज्ञम् इत्यसम्।” – भवप्रकाश निघण्टु 5.8

चिकित्सा समीक्षक

Syed Aman Hussain

Reviewed By

Syed Aman Hussain

BAMS, MD

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