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आयुर्वेदिक औषधि

अजीर्ण कंठ रस

संदर्भ: Bhāvaprakāśa – Jaṭharāgnivikārādhikāra (अध्याय 6: 108‑109); Bhaiṣajyaratnāvalī (Śūlarogādhikāra)

अजीर्ण कंठ रस एक पारंपरिक आयुर्वेदिक रसा-योग है, जिसे शुद्ध खनिज और मसालों के पाउडर से तैयार किया जाता है। यह पाचन शक्ति को बढ़ाने, कफ को शांत करने और पाचन तंत्र का समर्थन करने के लिए प्रयोग किया जाता है।

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उपयोग और लाभ

अजीर्ण (डिसपेप्सिया), अग्निमांद्य (कमजोर पाचन शक्ति), और कफ रोग (कफ संबंधित विकार)।

मुख्य सामग्री

  • तंकण शुद्धा (शुद्ध तंकरण – एक प्रकार का एल्यूम) – रसाधारा (वाहक)। मिश्रण को बाँधता है, ठंडक देता है और जलन कम करता है।
  • कण (पिप्पली) – दीर्घ बूटिया – उष्ण और वात-शामक। पाचन शक्ति बढ़ाता है, अवशोषण में सुधार करता है और आंतों में ठहराव को दूर करता है।
  • अमरता (शुद्ध वत्सनाभा) – शुद्ध सल्फर – उष्ण और रस-वर्धक। अग्नि उत्तेजित करता है, मेटाबॉलिज्म का समर्थन करता है और जीवाणुरोधी कार्य में सहायक होता है।
  • हिंग शुद्धा – शुद्ध हिंग (अस्फोटिडा) – वात-शामक और कार्मिनेटिव। गैस कम करता है, आंतों की गति बढ़ाता है और हल्की तीखी सुगंध जोड़ता है।
  • मरिका – काली मिर्च – उष्ण और जैव-उन्नयन। अन्य जड़ी-बूटियों की जैवउपलब्धता बढ़ाता है और अग्नि को और भी प्रबल बनाता है।
  • निम्बू पानी (कड़वा नीम पानी) – तिक्त (कड़वा) और कफ-पचाना। अतिरिक्त कफ-संतुलन और डिटॉक्सिफिकेशन प्रभाव देता है।

खुराक और अनुपान

सामान्य पाचन समर्थन, अजीर्ण, कफ असंतुलन: **125 mg – 250 mg** तैयार रस (पाउडर) प्रति डोज, गरम शहद या घी के साथ।

गंभीर अग्निमांद्य (कमजोर पाचन): अधिकतम **250 mg** दिन में दो बार, वही वाहक के साथ। हल्का और आसानी से पचने वाला आहार साथ लें।

परिचय

अजीर्ण कंठ रस एक पुरानी *रसा-योग* है जिसे शुद्ध खनिज और मसालों के पाउडर से बनाया जाता है। इसे पाचन शक्ति बढ़ाने, कफ को शांत करने और पाचन पथ का समर्थन करने के लिए प्रयोग किया जाता है। यह फॉर्मुलेशन खासकर अजीर्ण, कमजोर पचन और अग्नि संबंधित रोगों के इलाज के लिए मूल्यवान है।

उपचारात्मक उपयोग

अजीर्ण कंठ रस का उपयोग निम्नलिखित स्थितियों में किया जाता है:

  • अजीर्ण (डिसपेप्सिया) – भूख बढ़ाता है और भरा हुआ महसूस कम करता है।
  • अग्निमांद्य (कमजोर पाचन शक्ति) – अग्नि को उत्तेजित करता है और मेटाबॉलिज्म को बेहतर बनाता है।
  • कफ रोग – अधिक कफ को संतुलित करता है, जिससे धीमे पाचन और श्लेष्मा की अधिकता जैसी स्थितियाँ कम होती हैं।

> “सत्य-जिरणं शान्तं वानेर वृद्ध्यै कफध्वस्टैया” – यह श्लोक (Bhāvaprakāśa) अग्नि और कफ पर इसके शांत प्रभाव को दर्शाता है।

प्रमुख अवयव

अजीर्ण कंठ रस के प्रमुख अवयव और उनकी भूमिकाएँ:

  • तंकण शुद्धा (शुद्ध तंकरण – एक प्रकार का एल्यूम) – रसाधारा (वाहक) के रूप में कार्य करता है। मिश्रण को बाँधता है, ठंडक देता है और जलन कम करता है।
  • कण (पिप्पली) – दीर्घ बूटिया – उष्ण और वात-शामक। पाचन शक्ति बढ़ाता है, अवशोषण में सुधार करता है और आंतों में ठहराव को दूर करता है।
  • अमरता (शुद्ध वत्सनाभा) – शुद्ध सल्फर – उष्ण और रस-वर्धक। अग्नि उत्तेजित करता है, मेटाबॉलिज्म का समर्थन करता है और जीवाणुरोधी कार्य में सहायक होता है।
  • हिंग शुद्धा – शुद्ध हिंग (अस्फोटिडा) – वात-शामक और कार्मिनेटिव। गैस कम करता है, आंतों की गति बढ़ाता है और हल्की तीखी सुगंध जोड़ता है।
  • मरिका – काली मिर्च – उष्ण और जैव-उन्नयन। अन्य जड़ी-बूटियों की जैवउपलब्धता बढ़ाता है और अग्नि को और भी प्रबल बनाता है।
  • निम्बू पानी (कड़वा नीम पानी) – तिक्त (कड़वा) और कफ-पचाना। अतिरिक्त कफ-संतुलन और डिटॉक्सिफिकेशन प्रभाव देता है।

सभी अवयव **1:1:1:1:2:क्यू.एस.** अनुपात में हैं, सिवाय मरिका (2 भाग) और निम्बू पानी (क्यू.एस.) के।

खुराक और अनुपान

अजीर्ण कंठ रस की खुराक और अनुपान निम्नलिखित हैं:

| परिस्थिति | अनुशंसित खुराक | अनुपान (वाहक) |

| सामान्य पाचन समर्थन, अजीर्ण, कफ असंतुलन | **125 mg – 250 mg** तैयार रस (पाउडर) प्रति डोज | गरम शहद या घी के साथ लें |

| गंभीर अग्निमांद्य (कमजोर पाचन) | अधिकतम **250 mg** दिन में दो बार | वही वाहक; हल्का, आसानी से पचने वाला आहार साथ ले सकते हैं |

यह खुराक शास्त्रीय नुस्खे (125‑250 mg) से ली गई है।

अजीर्ण कंठ रस का विज्ञान

शास्त्रीय तर्क

रसा-योग में शुद्ध तंकरण एक वाहक के रूप में कार्य करता है, जिससे शक्तिशाली जड़ी-बूटियों का विर्य (ऊर्जा) धीरे-धीरे निकलता है। पिप्पली, मरिका, सल्फर जैसे उष्ण मसालों के साथ हिंग और एल्यूम जैसे ठंडे पदार्थ मिलकर 'समान-विर्य' (संतुलित शक्ति) बनाते हैं। इससे अग्नि स्थिर रहती है बिना शरीर को अधिक उत्तेजित किए।

फार्माकोलॉजिकल तर्क

अजीर्ण कंठ रस के फार्माकोलॉजिकल प्रभाव निम्नलिखित हैं:

  • **पिप्पली** और **मरिका** गैस्ट्रिक स्राव और गतिशीलता बढ़ाते हैं, जो अजीर्ण और अग्निमांद्य के उपचार के अनुरूप है।
  • **सल्फर** में जीवाणुरोधी गुण होते हैं जो हल्के आंत्र संक्रमण से लड़ने में मदद करते हैं।
  • **हिंग** आंतों की गैस कम करता है और मसालों के कार्मिनेटिव कार्य को पूरा करता है।
  • **एल्यूम** सूक्ष्म खनिज प्रदान करता है और म्यूकोसल जलन में कसैला प्रभाव डालता है।

इन सभी कार्यों का संयुक्त प्रभाव पाचन शक्ति को पुनर्जीवित करता है, कफ को संतुलित करता है और आंतों की परत की रक्षा करता है।

चिकित्सा समीक्षक

Syed Aman Hussain

Reviewed By

Syed Aman Hussain

BAMS, MD

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