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आयुर्वेदिक औषधि

अभ्यंग विथ घृत: वात संतुलन और स्रोतोशोधन के लिए आसान आयुर्वेदिक उपचार

संदर्भ: अष्टांग हृदय, सूत्रस्थान २/७-८; चरक संहिता, सिद्धिस्थान ६/६८-७८; सुश्रुत संहिता, चिकित्सास्थान ३४/११

अभ्यंग विथ घृत एक पारंपरिक आयुर्वेदिक उपचार है जिसमें घृत (स्पष्ट घी) का उपयोग करके शरीर की गहरी मालिश की जाती है। यह वात और पित्त दोषों को संतुलित करता है, स्रोतों (माइक्रोचैनल्स) को साफ़ करता है और तनाव तथा दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्याओं में राहत प्रदान करता है।

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उपयोग और लाभ

मांसपेशियों और जोड़ों के दर्द: गठिया, पीठ दर्द, गर्दन दर्द, और फाइब्रोमायल्जिया।

तंत्रिका तंत्र संबंधी समस्याएँ: स्ट्रोक के बाद की स्थिति, पार्किंसन रोग, मल्टीपल स्केलेरोसिस, और परिधीय न्यूरोपैथी।

मानसिक और नींद संबंधी विकार: अनिद्रा, चिंता, क्रोनिक फटीग सिंड्रोम, और बर्नआउट।

त्वचा संबंधी समस्याएँ: शुष्क एक्जिमा, सोरायसिस, और सेनील प्रुरिटस।

मुख्य सामग्री

अभ्यंग के लिए घृत (स्पष्ट घी) का उपयोग किया जाता है, जो वात और पित्त दोषों को संतुलित करने में सहायक होता है। विभिन्न प्रकार के घृत का उपयोग विशिष्ट स्वास्थ्य समस्याओं के लिए किया जा सकता है:

  • गाय का घृत: सामान्य स्वास्थ्य और वात-पित्त संतुलन के लिए।
  • धौत घृत: त्वचा पर जलन या सूजन के लिए।

खुराक और अनुपान

अभ्यंग की प्रक्रिया को तीन चरणों में विभाजित किया जाता है:

I. पूर्व कर्म (तैयारी)

  • स्वास्थ्य जाँच: रोगी की पाचन शक्ति और आंतों की स्थिति की जाँच करें।
  • कमरे को गर्म और हवा रहित रखें।
  • घृत को ३८-४०°C तक गर्म करें, सीधे आंच पर नहीं।

II. प्रधान कर्म (मुख्य प्रक्रिया)

  • सिर की मालिश: ५ मिनट तक सिर की मालिश करें, जिससे मस्तिष्क शांत होता है।
  • शरीर की मालिश: गर्दन से पैर तक लंबी नीचे की ओर स्ट्रोक लगाएँ, बालों की दिशा में।
  • स्ट्रोक की दिशा: ऊपर की ओर या बालों के विपरीत स्ट्रोक न करें, इससे हृदय को नुकसान पहुँच सकता है।

III. पश्चात कर्म (इलाज के बाद की सावधानियाँ)

  • भाप दें: हल्की भाप से घृत को गहराई तक पहुँचने में मदद मिलती है और विषाक्त पदार्थ बाहर निकलते हैं।
  • आराम: रोगी को १५-२० मिनट आराम करने दें।

अभ्यंग क्या है?

अभ्यंग एक दैनिक तेल मालिश है जो आयुर्वेद का अभिन्न अंग है। यह शरीर को साफ़-सफाई और संतुलन प्रदान करने के लिए किया जाता है। जब इसे घृत (स्पष्ट घी) के साथ किया जाता है, तो यह त्वचा की देखभाल से आगे बढ़कर शरीर के गहरे ऊतकों तक पोषक तत्व पहुँचाता है। यह दीर्घकालिक स्वास्थ्य और तनाव से राहत के लिए एक प्रभावी उपचार है।

नाम का अर्थ (एटिमोलॉजी)

अभ्यंग शब्द संस्कृत के दो शब्दों से मिलकर बना है — 'अभि' (तर्फ) और 'अंग' (शरीर का अंग)। इस प्रकार, अभ्यंग का अर्थ है शरीर के अंगों पर तेल लगाना ताकि उन्हें मजबूती और संतुलन मिले।

प्राचीन ज्ञान और श्लोक

अभ्यङ्गमाचरेन्नित्यं स जराश्रमवातहा। दृष्टिप्रसादपुष्ट्यायुःस्वप्नत्वक्त्वद्दार्ढ्यकृत्॥ — अष्टांग हृदय, सूत्रस्थान २/७-८

इस श्लोक का अर्थ है कि अभ्यंग को रोज़ाना करना चाहिए। यह बुढ़ापे, थकान और वात दोष के बढ़ने को रोकता है। इससे दृष्टि स्पष्ट होती है, शरीर पुष्ट होता है, आयु बढ़ती है, नींद अच्छी आती है, त्वचा स्वस्थ रहती है और शरीर मज़बूत बनता है।

अभ्यंग विथ घृत शरीर पर कैसे काम करता है?

दोषों पर प्रभाव: घृत वात और पित्त दोनों दोषों को शांत करता है क्योंकि यह स्निग्ध (तैलीय), गुरु (भारी), मृदु (नरम) और शीतल (ठंडा) होता है। इसका मधुर रस और मधुर विपाक (पाचन के बाद का प्रभाव) इसे वात और पित्त दोषों के लिए आदर्श बनाता है।

आधुनिक विज्ञान के अनुसार:

  • त्वचा के माध्यम से तेल का अवशोषण: घृत में मौजूद फैटी एसिड त्वचा की लिपिड परत को पार करके शरीर में प्रवेश करते हैं, जिससे पोषक तत्व सीधे ऊतकों तक पहुँचते हैं।
  • तंत्रिका तंत्र को शांत करना: मालिश से तंत्रिका तंत्र शांत होता है, जिससे तनाव कम होता है और नींद की गुणवत्ता में सुधार होता है।
  • रक्त और लसीका संचार में सुधार: मालिश से रक्त और लसीका का प्रवाह बढ़ता है, जिससे शरीर से विषाक्त पदार्थ बाहर निकलते हैं।
  • मांसपेशियों को आराम: गर्म घृत मांसपेशियों को गर्म और ढीला करता है, जिससे गतिशीलता में सुधार होता है।

उपयोग की जाने वाली सामग्री

  • गाय का घृत: सबसे सामान्य और वात-पित्त दोषों के लिए उपयुक्त।
  • धौत घृत: त्वचा पर जलन या सूजन वाले मामलों में उपयोगी।
  • जड़ी-बूटी युक्त घृत: मस्तिष्क और मानसिक स्वास्थ्य के लिए लाभकारी।
  • सुकुमार घृत: गंभीर वात रोगों और पीठ दर्द के लिए प्रभावी।

चिकित्सा समीक्षक

Syed Aman Hussain

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Syed Aman Hussain

BAMS, MD

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